मर मर के डरना या डर डर के मरना - सब मैंने छोड़ दिया है
मैंने डरना छोड़ दिया है
समझ लें, मरना छोड़ दिया है
इस देश में लोग
पल पल मरा करते हैं
वे दिन भी क्या दिन थे
मैं भी खूब डरा करता था
दर्द के डर से
खूब डरा रहता था
पर अति प्रत्येक चीज की
नेक हो जाती है
अब दर्द नहीं डरा पाता
यह मैंने जान लिया है
जो मरने से नहीं डरता
समझ लें, मर कर भी नहीं मरता
इस तरह खूब जीता हूं मैं
भरपूर खुशी पीता हूं मैं
हँस हँस के।
अब मैं डरता नहीं हूं
जाहिर है, मरता नहीं हूं।
लोग डर के मारे
बिना मरे ही मर जाते हैं
बिना मारे भी मर जाते हैं
मरने के बाद भी
लौट कर घर पहुंच
चारपाई के नीचे छिप जाते हैं
जो होना है
वो होना है
फिर किस बात का रोना है
दुख का बना लेते बिछौना है
क्यों रोना है
खुद जिओ
और सबको जीने दो
सिर्फ डर को
जिंदगी का खून
मत पीने दो।
समझ लें, मरना छोड़ दिया है
इस देश में लोग
पल पल मरा करते हैं
वे दिन भी क्या दिन थे
मैं भी खूब डरा करता था
दर्द के डर से
खूब डरा रहता था
पर अति प्रत्येक चीज की
नेक हो जाती है
अब दर्द नहीं डरा पाता
यह मैंने जान लिया है
जो मरने से नहीं डरता
समझ लें, मर कर भी नहीं मरता
इस तरह खूब जीता हूं मैं
भरपूर खुशी पीता हूं मैं
हँस हँस के।
अब मैं डरता नहीं हूं
जाहिर है, मरता नहीं हूं।
लोग डर के मारे
बिना मरे ही मर जाते हैं
बिना मारे भी मर जाते हैं
मरने के बाद भी
लौट कर घर पहुंच
चारपाई के नीचे छिप जाते हैं
जो होना है
वो होना है
फिर किस बात का रोना है
दुख का बना लेते बिछौना है
क्यों रोना है
खुद जिओ
और सबको जीने दो
सिर्फ डर को
जिंदगी का खून
मत पीने दो।
दैनिक हिन्दुस्तान में आदर्श नगर में आयोजित ब्लॉगर सेमिनार की खबर
विनोद पाराशर जी मेल तो नहीं कर पाये परंतु उन्होंने मेल करा दिया। इस मेल के लिए वे आभार के हकदार हैं।दैनिक हिन्दी हिन्दुस्तान में आज दिनांक 23 जनवरी 2011 को प्रकाशित इस समाचार की सूचना देने के लिए विनोद पाराशर जी का आभार। जबकि इस खबर में पाराशर जी का नामोल्लेख होने से रह गया है। हिन्दी प्रेम हो तो ऐसा। विनोद पाराशर राजभाषा विकास मंच, हंसगुल्ले, नया घर और नास्तिक की डायरी। एक ब्लॉग जागरण जंक्शन पर दोस्ती भी है।
भीषण सर्दी में कीजिए गर्मी का अहसास : ऑटो चालक और दांत-डॉक्टर संवाद
रात को दस बजे कड़कड़ाती ठंड में एक दांतों के डॉक्टर अपना क्लिक बढ़ा रहे थे। दुकानदार जानते हैं कि बढ़ाना क्या होता है और घटाना क्या।
उसी समय एक मरीज का आगमन होता है। जिसके दांत में सख्त दर्द है जबकि असलित यह है कि दर्द कभी दांत में नहीं होता है, मसूढ़े में होता है।
मरीज का दांत आधा टूटा हुआ है। मरीज कह रहा है शायद निकलवाना ही पड़ेगा।
दांतों के डॉक्टर पूछते हैं कि आप क्या करते हैं, मरीज कहता है, उससे क्या फर्क पड़ता है।
पड़ता है डॉक्टर ने कहा।
मैं ऑटो रिक्शा चालक हूं। परिचय मिलते ही डॉक्टर कहते हैं कि इस समय मैं घर जा रहा हूं। मैं आपके दांत का कोई इलाज नहीं कर सकता।
डॉक्टर साहब मैं ज्यादा पैसे देने के लिए भी तैयार हूं, आखिर मैं भी तो मजबूरी का फायदा ही उठाता हूं।
ठीक है डॉक्टर कहते हैं। मेरी फीस है दांत निकालने की, 500 रुपये, जिस पर आपको 50 प्रतिशत अधिक देने होंगे। यह तो बहुत ज्यादा हैं, ज्यादा नहीं हैं यह तो नाइट चार्जिस हैं।
उसी समय डॉक्टर को मरीज के हाथ में एक बैग दिखलाई देता है। डॉक्टर पूछते हैं आपके हाथ में क्या है, यह मेरा बैग है, दांत मसूड़ा पीडि़त ऑटो चालक बतलाता है।
ठीक है आइये और इस कुर्सी पर बैठिए और अपना बैग एक कोने में रख दीजिए, इसके 10 पर्सेंट एक्स्ट्रा होंगे।
सोचिए हम कहां जा रहे हैं ???
उसी समय एक मरीज का आगमन होता है। जिसके दांत में सख्त दर्द है जबकि असलित यह है कि दर्द कभी दांत में नहीं होता है, मसूढ़े में होता है।
मरीज का दांत आधा टूटा हुआ है। मरीज कह रहा है शायद निकलवाना ही पड़ेगा।
दांतों के डॉक्टर पूछते हैं कि आप क्या करते हैं, मरीज कहता है, उससे क्या फर्क पड़ता है।
पड़ता है डॉक्टर ने कहा।
मैं ऑटो रिक्शा चालक हूं। परिचय मिलते ही डॉक्टर कहते हैं कि इस समय मैं घर जा रहा हूं। मैं आपके दांत का कोई इलाज नहीं कर सकता।
डॉक्टर साहब मैं ज्यादा पैसे देने के लिए भी तैयार हूं, आखिर मैं भी तो मजबूरी का फायदा ही उठाता हूं।
ठीक है डॉक्टर कहते हैं। मेरी फीस है दांत निकालने की, 500 रुपये, जिस पर आपको 50 प्रतिशत अधिक देने होंगे। यह तो बहुत ज्यादा हैं, ज्यादा नहीं हैं यह तो नाइट चार्जिस हैं।
उसी समय डॉक्टर को मरीज के हाथ में एक बैग दिखलाई देता है। डॉक्टर पूछते हैं आपके हाथ में क्या है, यह मेरा बैग है, दांत मसूड़ा पीडि़त ऑटो चालक बतलाता है।
ठीक है आइये और इस कुर्सी पर बैठिए और अपना बैग एक कोने में रख दीजिए, इसके 10 पर्सेंट एक्स्ट्रा होंगे।
सोचिए हम कहां जा रहे हैं ???
हिन्दी ब्लॉगिंग के एक सेमिनार में शामिल ब्लॉगरों के हथियारों की झलक : क्या आप बतला सकते हैं कि किसका हाथ है, किसके पास है क्या ?
पाखी में राजीव तनेजा और तेजेन्द्र शर्मा : चोरी और सीनाजोरी पर ब्लॉगनामा में प्रतिभा कुशवाहा ने लिखा है
अमिताभ बच्चन ने ट्रैक्टर चलाया और ट्विटर पर बतलाया
अरे, वे अभिनेता नहीं
वे जो हैं किसान
लखनऊ गए थे
आज खबर है
वहां पर उन्होंने चलाया है ट्रैक्टर
बतलाया है ट्विटर पर
वे ट्रैक्टर चलाएं
या ट्विटर बजाएं
बन जाती है खबर
पर यह खबर
न तो पहुंचती है
किसानों तक
न उन नौजवानों तक
वे नौ जवान कौन हैं
अरे वही जो दस नहीं है
वे ही तो नौ हैं
उनके लिए सब जगह नो है
हमारे लिए भी कौनो हां है
सब जगह हमारे लिए भी ना है
कोई अखबार नहीं छापता
हमारे ट्विटर
नहीं बनाता खबर
कितनी पोस्टें लिख रहे हैं
हिन्दी को फैला रहे हैं
वे खेत करते हैं समतल
तो भर जाता है
चैनलों और अखबारों का धरातल
हमारे कार्य डूब जाते हैं
चले जाते हैं रसातल
उनकी ही चर्चा होती है
जो चर्चा में होते हैं
हम चर्चा में नहीं हैं
इसलिए हमारी चर्चा कौन करे
वे जो हैं किसान
लखनऊ गए थे
आज खबर है
वहां पर उन्होंने चलाया है ट्रैक्टर
बतलाया है ट्विटर पर
वे ट्रैक्टर चलाएं
या ट्विटर बजाएं
बन जाती है खबर
पर यह खबर
न तो पहुंचती है
किसानों तक
न उन नौजवानों तक
वे नौ जवान कौन हैं
अरे वही जो दस नहीं है
वे ही तो नौ हैं
उनके लिए सब जगह नो है
हमारे लिए भी कौनो हां है
सब जगह हमारे लिए भी ना है
कोई अखबार नहीं छापता
हमारे ट्विटर
नहीं बनाता खबर
कितनी पोस्टें लिख रहे हैं
हिन्दी को फैला रहे हैं
वे खेत करते हैं समतल
तो भर जाता है
चैनलों और अखबारों का धरातल
हमारे कार्य डूब जाते हैं
चले जाते हैं रसातल
उनकी ही चर्चा होती है
जो चर्चा में होते हैं
हम चर्चा में नहीं हैं
इसलिए हमारी चर्चा कौन करे
रोहतक में चल रहा है इंटरनेशनल हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन
अभी सतीश सक्सेना जी को फोन लगाया तो मालूम हुआ है कि वे रोहतक पहुंच चुके हैं और अब तक वहां बीस के लगभग हिन्दी ब्लॉगर मौजूद हैं। नाश्ता जारी है। जिनमें ललित शर्मा, सिरमौर, सिरमौर नहीं जी मूंछधारी हैं, वैसे मूंछें तो औरों की भी होंगी परंतु मूंछों को जो ख्याति ललित जी ने दिलाई है, वो अप्रतिम है।
इस्मत जैदी जी के बारे में बात होती है। उसके बाद वे राज भाटिया जी से बात करवाते हैं। मुझे बहुत कमी महसूस हो रही है कि मैं वहां नहीं हूं। पर मन से वही हूं। अन्तर सोहिल जी भी वहीं हैं। निर्मला कपिला जी भी पहुंच चुकी हैं। अजय झा जी अवश्य ही मौजूद होंगे, मन कह रहा है। सच्चाई मन के साथ है, यहां देखिए।
यहां बाज न आया राजा जबकि खूब बजा है बाजा के मोलतोल पर चर्चे हैं, सोच रहा हूं हिन्दी ब्लॉग जगत का राजा कौन है ? जो टिप्पणियां देता है या जिसको खूब टिप्पणियां मिलती हैं अथवा वे जो रोहतक में मौजूद हैं। वैसे इस समय समीर लाल जी और राज भाटिया जी ही राजा हैं। मेरा यह मानना है,आप क्या मानते हैं ?
दिल्ली के किसी नुक्कड़ पर समीर लाल जी मिल जाएं तो हैरत मत कीजिएगा
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| मेरे ऊपर माउस चलायें |
शनिवार 13 नवम्बर 2010 को सांय 3 बजे से आरंभ होने वाले इस कार्यक्रम में देश-विदेश के कई हिन्दी ब्लॉगर ब्लॉग की भूमिका पर चिंतन करेंगे। तो आप पधार रहे हैं न, इस निमंत्रण को ही व्यक्तिगत बुलावे की मान्यता प्रदान करें और अपने संपर्क के हिन्दी ब्लॉगरों को इस कार्यक्रम की सूचना फोन, मेल इत्यादि के जरिए अवश्य पहुंचायें ताकि जानकारी के अभाव में वे कार्यक्रम में शामिल होने से न रह जायें।
प्रिंट मीडिया में वर्धा चर्चा : पाखी में प्रतिभा कुशवाहा ने लिखा : क्या आपने नहीं पढ़ा, वर्धा लाइव ....
शिवम् मिश्रा जी से मैं तो मिल लिया, आप भी मिल लीजिए
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| यादें |
भले ही उनके ब्लॉग का नाम बुरा भला है पर उनमें सब भला ही भला है और यही भला इंसानियत के लाभ में बदल जाता है। बेहद संवेदनशील हृदय के स्वामी शिवम् से जो भी मिलेगा, उनकी अनुभूतियों और अभिव्यक्ति का अवश्य ही मुरीद हो जायेगा। मैं तो हो ही गया हूं।
शिवम् भाई बातचीत में बतलाते हैं कि उन्हें यश की चाह नहीं है, ख्याति उनकी ब्लॉगिंग की राह नहीं है। यह बहुत अच्छी बात है, वैसे भी चाहा हुआ कब मिलता है। मैंने जरूर चाहा था कि मुझे सब जानें, पर सब सभी को जान सकें, ऐसा हो नहीं सकता। हां, मैं अवश्य सभी को जानने की कोशिश में जुटा रहता हूं। शिवम् ने यश नहीं चाहा, वे मिलते भी सिर्फ उनसे ही हैं, जिनसे मिलने का उनका दिल करता है। इसलिए मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूं कि उन्हें मेरे से और मुझे उनसे मिलने की चाह रही और वो चाह कल पूरी हुई बल्कि अब मन करता है कि उनके साथ और समय बिताया जाये। उनके बारे में और जाना जाये, यही जानना सीखना होता है, मैं सदा सीखते रहना चाहता हूं। चाहता हूं कि सबकी अच्छाईयों को सीख सकूं, अपना सकूं।
वे जब चर्चा करते हैं, तो उनका चर्चाकार मन उनके न चाहते हुए भी, उनकी चर्चा को, उनकी शैली के कारण विशिष्ट बना देता है। आपने उनकी ब्लॉग पोस्टें पढ़ी होंगी और उनकी चर्चाओं से आप सब रोजाना रूबरू होते रहते हैं। उनकी चर्चा शैली उन्हें सबसे अलग करती है।
वे दिल्ली में चला बिहारी ब्लॉगर बनने उर्फ सलिल जी से भी मैनपुरी से आकर मिल लिए और मैं दिल्ली में रहकर भी नहीं जान पाया कि वे सलिल जी हैं और भारत की राजधानी दिल्ली के दिल में मिलते हैं। दिल्ली के दिल के उस संवेदनशील हिस्से में मैं अभी तक पहुंच नहीं पाया हूं पर पहुंचना जरूर चाहूंगा। देखते हैं वो सुयोग कब बनता है।
बात महफूज भाई के जन्मदिन से शुरू होकर, गोरखपुर की गोलियों तक भी गई। ब्लॉगिंग की गलियों में घूमती-फिरती बातें खूब हुईं, जितनी आधे घंटे में हो सकती थीं, उससे भी अधिक और उन बातों की ऊर्जा को ठंडी काफी भी ठंडा नहीं कर पाई क्योंकि कोल्ड काफी भी ठंडी होते हुए भी ऊष्मा ही प्रदान करती है।
जब हम मिले तो मिल बैठने के लिए साकेत की जे ब्लॉक की मार्केट में पहले तल्ले पर स्थित उस जगह पर पहुंच गए जो हमारे दोनों के अनुकूल नहीं थी। वहां पीने के लिए काफी, चाय तो थी पर माहौल नहीं था। हमने बाहर निकलने का मन बनाया और मन के उत्तर की प्रतीक्षा से पहले ही बाहर आ गए।
फिर हम भूतल पर सही जगह पर पहुंचे और जितना बतिया सकते थे, बतियाये। इसी बीच हमें अपने मोबाइल फोनों की याद आई, जो इन क्षणों को याद करना चाहते थे। हमने उन्हें अपनी याद कराई, उस याद की एक बानगी आप कल इसमें देख चुके हैं और मैनपुरी पहुंचने पर भाई शिवम् मिश्रा की कलम यानी कीबोर्ड के जरिए उनके ब्लॉग पर जल्दी ही देखेंगे पर वो जल्दी इस महीने नहीं, अगले महीने होगी, वो बात दीगर है कि अगले महीने का पहला सप्ताह ही होगा।
अब तक तो आप बोर हो चुके होंगे, इसलिए मैं और अधिक न लिखते हुए, यहां से हटता हूं। इस ख्वाहिश के साथ कि जिन बातों का उल्लेख करना, मैं भूल गया हूं, वे बातें भाई शिवम् जी अवश्य कहेंगे।
चलते-चलते मैं शिवम् भाई को अमिताभ बच्चन का अंगूठा थमाना नहीं भूला, आप भी थाम लीजिए।
पवित्रा अग्रवाल रचित लघुकथा अनुमान
बिग बाजार में प्रवेश करते ही वर्मा जी की नजर अपने परिचित राम बाबू पर पड़ी तो वह खुश होते हुए उनके पास पहुंचे ---'नमस्ते राम बाबू ,अकेले अकेले क्या शॉपिंग हो रही है ? '
' नमस्ते वर्मा जी ,असल में हम दोनों एक सप्ताह बाद तीन महीने के लिए बेटे के पास अमेरिका जा रहे है ,बस उसी की तैयारी चल रही है.'
'अच्छा तो आप दादा बनने वाले है .'
चौंकते हुए राम बाबू ने पूछा -- 'हाँ , पर आप को कैसे पता ?'
वर्मा जी कहने को थे कि अक्सर ऐसा ही तो होता है पर वह अपने को सम्हालते हुए बोले --'आप के चेहरे पर बिखरी ख़ुशी देख कर अनुमान लगा लिया था .मेरी अग्रिम बधाई स्वीकार कीजिए.'
घरोंदा -4-7-126 , ईसामिया बाजार , हैदराबाद --500027
' नमस्ते वर्मा जी ,असल में हम दोनों एक सप्ताह बाद तीन महीने के लिए बेटे के पास अमेरिका जा रहे है ,बस उसी की तैयारी चल रही है.'
'अच्छा तो आप दादा बनने वाले है .'
चौंकते हुए राम बाबू ने पूछा -- 'हाँ , पर आप को कैसे पता ?'
वर्मा जी कहने को थे कि अक्सर ऐसा ही तो होता है पर वह अपने को सम्हालते हुए बोले --'आप के चेहरे पर बिखरी ख़ुशी देख कर अनुमान लगा लिया था .मेरी अग्रिम बधाई स्वीकार कीजिए.'
घरोंदा -4-7-126 , ईसामिया बाजार , हैदराबाद --500027
हिन्दी ब्लॉग जगत की उड़नतश्तरी जल्दी ही दिल्ली में : जरा बारिश तो कम होने दीजिए
| पहचानें |
तो जो भी समीरलाल यानी उड़नतश्तरी से रूबरू होना चाहें तो अपनी जिज्ञासा टिप्पणी बॉक्स में दर्ज कर जाएं।














