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| यादें |
भले ही उनके ब्लॉग का नाम बुरा भला है पर उनमें सब भला ही भला है और यही भला इंसानियत के लाभ में बदल जाता है। बेहद संवेदनशील हृदय के स्वामी शिवम् से जो भी मिलेगा, उनकी अनुभूतियों और अभिव्यक्ति का अवश्य ही मुरीद हो जायेगा। मैं तो हो ही गया हूं।
शिवम् भाई बातचीत में बतलाते हैं कि उन्हें यश की चाह नहीं है, ख्याति उनकी ब्लॉगिंग की राह नहीं है। यह बहुत अच्छी बात है, वैसे भी चाहा हुआ कब मिलता है। मैंने जरूर चाहा था कि मुझे सब जानें, पर सब सभी को जान सकें, ऐसा हो नहीं सकता। हां, मैं अवश्य सभी को जानने की कोशिश में जुटा रहता हूं। शिवम् ने यश नहीं चाहा, वे मिलते भी सिर्फ उनसे ही हैं, जिनसे मिलने का उनका दिल करता है। इसलिए मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूं कि उन्हें मेरे से और मुझे उनसे मिलने की चाह रही और वो चाह कल पूरी हुई बल्कि अब मन करता है कि उनके साथ और समय बिताया जाये। उनके बारे में और जाना जाये, यही जानना सीखना होता है, मैं सदा सीखते रहना चाहता हूं। चाहता हूं कि सबकी अच्छाईयों को सीख सकूं, अपना सकूं।
वे जब चर्चा करते हैं, तो उनका चर्चाकार मन उनके न चाहते हुए भी, उनकी चर्चा को, उनकी शैली के कारण विशिष्ट बना देता है। आपने उनकी ब्लॉग पोस्टें पढ़ी होंगी और उनकी चर्चाओं से आप सब रोजाना रूबरू होते रहते हैं। उनकी चर्चा शैली उन्हें सबसे अलग करती है।
वे दिल्ली में चला बिहारी ब्लॉगर बनने उर्फ सलिल जी से भी मैनपुरी से आकर मिल लिए और मैं दिल्ली में रहकर भी नहीं जान पाया कि वे सलिल जी हैं और भारत की राजधानी दिल्ली के दिल में मिलते हैं। दिल्ली के दिल के उस संवेदनशील हिस्से में मैं अभी तक पहुंच नहीं पाया हूं पर पहुंचना जरूर चाहूंगा। देखते हैं वो सुयोग कब बनता है।
बात महफूज भाई के जन्मदिन से शुरू होकर, गोरखपुर की गोलियों तक भी गई। ब्लॉगिंग की गलियों में घूमती-फिरती बातें खूब हुईं, जितनी आधे घंटे में हो सकती थीं, उससे भी अधिक और उन बातों की ऊर्जा को ठंडी काफी भी ठंडा नहीं कर पाई क्योंकि कोल्ड काफी भी ठंडी होते हुए भी ऊष्मा ही प्रदान करती है।
जब हम मिले तो मिल बैठने के लिए साकेत की जे ब्लॉक की मार्केट में पहले तल्ले पर स्थित उस जगह पर पहुंच गए जो हमारे दोनों के अनुकूल नहीं थी। वहां पीने के लिए काफी, चाय तो थी पर माहौल नहीं था। हमने बाहर निकलने का मन बनाया और मन के उत्तर की प्रतीक्षा से पहले ही बाहर आ गए।
फिर हम भूतल पर सही जगह पर पहुंचे और जितना बतिया सकते थे, बतियाये। इसी बीच हमें अपने मोबाइल फोनों की याद आई, जो इन क्षणों को याद करना चाहते थे। हमने उन्हें अपनी याद कराई, उस याद की एक बानगी आप कल इसमें देख चुके हैं और मैनपुरी पहुंचने पर भाई शिवम् मिश्रा की कलम यानी कीबोर्ड के जरिए उनके ब्लॉग पर जल्दी ही देखेंगे पर वो जल्दी इस महीने नहीं, अगले महीने होगी, वो बात दीगर है कि अगले महीने का पहला सप्ताह ही होगा।
अब तक तो आप बोर हो चुके होंगे, इसलिए मैं और अधिक न लिखते हुए, यहां से हटता हूं। इस ख्वाहिश के साथ कि जिन बातों का उल्लेख करना, मैं भूल गया हूं, वे बातें भाई शिवम् जी अवश्य कहेंगे।
चलते-चलते मैं शिवम् भाई को अमिताभ बच्चन का अंगूठा थमाना नहीं भूला, आप भी थाम लीजिए।



7 comments:
dhanyawaad Shivam jjees e milane ke liye, ab Shivam ji ke lekh ka intzaar rahega ki aapse kya rah gaya batane ko, jo wo poora kar denge...
हमें भी बुला लिया करो अविनाश भाई !
एक अच्छे और स्नेही दिल वाले हैं शिवम् मिश्र ...ऐसे निश्छल मन के लोग ब्लाग जगत में मिठास घालते रहते हैं ! हार्दिक शुभकामनायें !
अविनाश भाई आपका बहुत बहुत आभार .... आपने उस आधे घंटे की मुलाकात को आने वाले असीम समय तक के लिए जो सहेज दिया यहाँ इस पोस्ट के रूप में ! अभी भी घर के कामो में ही जुटा हुआ हूँ सो दिल्ली यात्रा पर पोस्ट लिखना नहीं हो पाया है ....पर हाँ जल्द ही लिखुगा!
13 नवम्बर 2010 के लिए तैयार रहिएगा, सतीश भाई।
अरे आप तो मिल लिए अविनाश भाई ...ये अपना ही कनेक्शन हर बार आउट औफ़ रीच हो जाता है खैर ..अपन भी २०१० के बीतने से पहिले ही उनसे वार्ता न कर लिए तो ..अपना भी नाम ....हां वही वही ...झाजी नहीं ॥
शिवम जी से आपकी मुलाकात तो हो गयी।
अब हमारी बची हैं, देखते हैं कब होती है?
बहुत सुंदर मुलाकात, दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं.
रामराम.
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